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Monday, 11 June 2012


हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (33 - 44)



33
सख़ावत करो मगर फ़िज़ूलख़र्ची मत करो, किफ़ायत (मितव्ययता) करो मगर कंजूसी मत करो।

34
सबसे बड़ी दौलत ख़्वाहिशों (आकांक्षओं) का त्याग कर देना है।

35
जो व्यक्ति दूसरों के बारे में बिना सोचे समझे ऐसी बातें कह देता है जो उन को नापसन्द हों तो वह उस के बारे में ऐसी ऐसी बातें कह देते हैं जिन को वह जानते तक नहीं।

36
जिस ने अपनी ख़्वाहिशों को बढ़ा लिया उस ने अपने कर्म बरबाद कर लिए।

37
हज़रत अली (अ.स.) शाम देश (सीरिया) जाते हुए इराक़ के एक शहर अमबार से गुज़रे। वहाँ के किसान उन के आदर में घोड़ों से उतर गए और उन के घोड़े के आगे दौड़ने लगे। आप (अ.स.) ने उन से पूछा कि तुम ने यह काम क्यूँ किया? उन्होंने कहा कि यह हमारा आम रिवाज है और हम अपने हाकिमों के आदर में ऐसा ही करते हैं। आप (अ.स.) ने फ़रमाया कि ख़ुदा की क़सम तुम्हारे हाकिमों को तुम्हारे इस काम से कोई लाभ नहीं होता किन्तु तुम इस काम से अपने आप को इस दुनिया में तकलीफ़ में डालते हो और इस की वजह से परलोक में भी दुर्भाग्य मोल लेते हो। वह तकलीफ़ कितना घाटे का सौदा है जिस के नतीजे में परलोक में भी दण्ड मिले और वह आराम कितना लाभदायक है जिस का नतीजा नरक से सुरक्षा हो।

38
हज़रत अली (अ.स.) ने अपने पुत्र, हज़रत इमाम हसन (अ.स.) से फ़रमाया कि मुझ से चार और फिर चार बातें याद कर लो जिस के बाद तुम्हें किसी कार्य से हानि नहीं पहुँचे गी। सबसे बड़ी दौलत अक़्ल है और सबसे बड़ी ग़रीबी बेवक़ूफ़ी है। सबसे डरावना अकेलापन केवल अपने आप को पसन्द करना है और व्यक्ति की सबसे आदरणीय जाति उस का सदव्यवहार है।

ऐ पुत्र, ख़बरदार, कभी किसी बेवक़ूफ़ से दोस्ती न करना क्यूँकि वह तुम को लाभ पहुँचाना चाहे गा किन्तु हानि पहुँचा देगा। कभी किसी कंजूस से दोस्ती मत करना क्यूँकि वह ऐसे समय में तुम से दूर भाग जाएगा कि जब तुम को उस की सब से अधिक आवश्यकता हो गी। और देखो कभी किसी व्याभाचारी से दोस्ती न करना, वह तुम को बहुत सस्ते दामों में बेच देगा। और देखो कभी किसी झूटे से दोस्ती न करना क्यूँकि कि वह सराब (मृगमरीचिका) की तरह है जो तुम को दूर की चीज़ें पास और पास की चीज़ दूर दिखाएगा।

39
अगर मुसतहिब्बात,(अर्थात वो कार्य जिस के न करने पर दण्ड न मिले किन्तु जिस के करने से सवाब मिले) वाजिबात (जिस के न करने से दण्ड मिले तथा जिस के करने से सवाब मिले) के रास्ते में रुकावट पैदा करें तो कोई व्यक्ति उन के ज़रिए अल्लाह के नज़दीक नहीं हो सकता।

40
बुद्घिमान की ज़बान उसके दिल के पीछे होती है और बेवक़ूफ़ का दिल उसकी ज़बान के पीछे होता है।

सैय्यद रज़ी कहते हैं कि इस वाक्य में बहुत अजीब और पवित्र अर्थ छिपा हुआ है। अर्थात बुद्घिमान व्यक्ति बहुत सोच विचार करने के बाद ज़बान खोलता है और बेवक़ूफ़ इंसान जो कुछ उस के दिल में आता है बिना सोचे समझे कह देता है इस तरह अक़्लमंद की ज़ुबान उस के आधीन  होती है और बेवक़ूफ़ का दिल उसकी ज़बान के आधीन होता है।

41
(यही बात दूसरे शब्दों में इस तरह कही गई है) बेवक़ूफ़ का दिल उस के मुँह के अन्दर रहता है और बुद्धिमान की ज़बान उस के दिल के अन्दर रहती है।

42
हज़रत अली (अ.स.) के एक सहाबी ने उन से अपनी बीमारी का शिकवा किया। जिस पर आप (अ.स.) ने फ़रमायाः अल्लाह ने तुम्हारी बीमारी को तुम्हारे पापों को धोने का साधन बनाया है, क्यूँकि खुद बीमारी के बदले में कोई पुण्य नहीं मिलता लेकिन यह पापों को मिटा देती है और उन को इस तरह झाड़ देती है जैसे वृक्ष से पत्ते झड़ते हैं। क्यूँकि पुण्य तब मिलता है जब ज़बान से कुछ कहा जाए या हाथ पैर से कोई काम किया जाय। और परवरदिगार अपने बन्दों में से जिस को चाहता है उस को नेक नियति और मन की पवित्रता के कारण स्वर्ग में दाख़िल कर देता है।

सैय्यद रज़ी कहते हैं कि इमाम (अ.स.) ने सही फ़रमाया कि बीमारी का कोई सवाब नहीं है। जब बन्दे पर कोई मुसीबत, बला या परेशानी आती है तो अल्लाह उस को उस मुसीबत का बदला देता है। बीमारी भी उन्हीं चीज़ों में से एक है जिन का बदला दिया जाता है और सवाब वो है जो अल्लाह की तरफ़ से बन्दों को उन के नेक काम के बदले में दिया जाता है। इमाम (अ.स.) ने यहाँ बदले और सवाब में अन्तर को बयान किया है।

43
एक बार हज़रत अली (अ.स.) ने ख़बाब बिन अरत को याद करते हुए उन के बारे में फ़रमाया, अल्लाह ख़बाब बिन अरत पर अपनी रहमत फ़रमाए, वह अपनी मर्ज़ी से इसलाम लाए, उन्हों ने अपनी खुशी से हिजरत की और ज़रूरत के मुताबिक़ क़नाअत की। वह ख़ुदा से राज़ी रहे और उन्होंने एक मुजाहिद की तरह ज़िन्दगी गुज़ारी।

44
वह व्यक्ति भाग्यशाली है जिसने परलोक को याद रखा, हिसाब किताब देने के लिए कर्म किए, जितनी ज़रूरत हो उतनी क़नाअत की और अल्लाह से राज़ी रहा।