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Tuesday, 17 July 2012

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (284 - 297)

284
ज्ञान ने बहाने करने वालों के बहानों को ख़त्म कर दिया है।

285
जिसे जल्दी मौत आ जाती है वो मोहलत का इच्छुक होता है और जिसे मोहलत दी जाती है वो (अपने कर्तव्य निभाने में) टाल मटोल करता है।

286
लोग किसी चीज़ पर वाह वाह नहीं करते मगर यह कि ज़माना उन के लिए एक बुरा दिन छिपाए हुए है।

287
आप(अ.स.) से क़ज़ा व क़द्र (अल्लाह की मर्ज़ी और इंसान के बस) के बारे में पूछा गया तो आप ने फ़रमायाः

यह एक अंधेरा रास्ता है इस की तरफ़ क़दम न बढ़ाओ। यह एक गहरा समुद्र है इस में न उतरो। यह अल्लाह का एक रहस्य है इस को जानने की कोशिश न करो।

288
जब अल्लाह किसी बन्दे को अपमानित करना चाहता है तो उस को ज्ञान से वंचित कर देता है।

289
अतीत में मेरा एक भाई था। हम दोनों अल्लाह के रास्ते में एक दूसरे के भाई थे। दुनिया उस की नज़रों में तुच्छ थी। उस का पेट उस पर हाकिम नहीं था। उस को जो चीज़ नहीं मिलती थी वो उस की आशा नहीं करता था। जो चीज़ उस को मिल जाती थी उस को अधिक उपयोग नहीं करता था। वो दिन में अधिकतर ख़ामोश रहता था किन्तु जब बोलता था तो बोलने वालों को ख़ामोश कर देता था और पूछने वालों की प्यास बुझा दिया करता था।

यूँ तो वो कमज़ोर था लेकिन जब जिहाद का अवसर आ जाता था तो जंगल का शेर और रेगिस्तान का साँप बन जाता था। वो जो दलील पेश करता था निर्णायक होती थी। और अगर किसी से शिकायत होती तो जब तक उस की बात सुन न ले उसे कुछ कहता नहीं था। अगर उस को कोई तकलीफ़ होती तो उस की शिकायत नहीं करता था जब तक कि वो ठीक न हो जाए। वो जो करता था वही कहता था और जो नहीं करता था उसे नहीं कहता था। लोग अगर उस से लड़ते तो वो ख़ामोश हो जाया करता था और लोग बोलने में उस पर हावी आ भी जाते थे तो ख़ामोश रहने में उस पर हावी नहीं आया जा सकता था। वो बोलने से अधिक सुनना पसंद करता था। और जब उस के सामने दो काम आते तो वो देखता कि कौन सा काम उस के मन को पसंद है ताकि उस के ख़िलाफ़ करे।

तुम्हें चाहिए कि तुम भी ऐसी ही आदतें अपनाओ और ऐसी आदतों को प्राप्त करने की होड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करो। किन्तु अगर तुम इन सब आदतों को नहीं अपना सकते तो जान लो कि इस में से कुछ को ही अपना लेना इस बात से अच्छा है कि तुम सब को ही छोड़ दो।

290
अगर अल्लाह ने पापों का दण्ड दिए जाने के बारे में न डराया होता तब भी उस ने जो नेमतें दी हैं उन के धन्यवाद का तक़ाज़ा यह है कि पाप न किया जाए।

291
अशअस इबने क़ैस को उस के पुत्र की मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए फ़रमायाः

ऐ क़ैस, अगर तुम अपने पुत्र की मृत्यु पर दुखी हो तो उस से जो तुम्हारा रिश्ता है उस की वजह से यह दुख सही है। किन्तु अगर तुम धैर्य रखो तो अल्लाह के पास हर मुसीबत के बदले एक पुरस्कार है। ऐ अशअस, अगर तुम ने धैर्य रखा तो अल्लाह का आदेश जारी होगा इस हाल में कि तुम पुण्य व पुरस्कार के अधिकारी होगे। किन्तु अगर तुम चीख़े चिल्लाए तो अल्लाह का आदेश तब भी जारी होगा मगर इस हाल में कि तुम पर पाप का बोझ होगा। तुम्हारा पुत्र तुम्हारे लिए हर्ष का कारण था जब कि वास्तविकता यह है कि वो तुम्हारे लिए कष्ट और परीक्षा था और तुम्हारे लिए शोक का कारण हुआ है जब कि वो मर कर तुम्हारे लिए पुरस्कार का कारण बना है।

292
हज़रत रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की क़ब्र पर उन को दफ़्न करते समय फ़रमायाः

धैर्य (सब्र) अच्छी चीज़ है सिवाए आप (स.) के शोक के, और व्याकुलता बुरी चीज़ है सिवाए आप (स.) के निधन पर और बेशक आप (स.) की मृत्यु का शोक महान है।

293
मूर्ख की संगत से दूर रहो क्यूँकि वो तुम्हारे सामने अपने कर्मों को सजा कर पेश करे गा और चाहेगा कि तुम भी उसी जैसे हो जाओ।

294
आप (अ.स.) से पूछा गया कि पूरब और पश्चिम में कितनी दूरी है तो आप ने फ़रमायाः

सूर्य के एक दिन के रास्ते के बराबर।

295
तुम्हारे मित्र तीन प्रकार के हैं और तुम्हारे शत्रु भी तीन तरह के हैं। तुम्हारा मित्र, तुम्हारे मित्र का मित्र और तुम्हारे शत्रु का शत्रु। और तुम्हारे शत्रु यह हैं। तुम्हारा शत्रु, तुम्हारे मित्र की शत्रु और तुम्हारे शत्रु का मित्र।

296
आप (अ.स.) ने एक व्यक्ति को देखा कि वो अपने शत्रु को एक ऐसी चीज़ से हानि पहुँचाना चाहता था जिस से स्वंय उस को भी हानि पहुँचती। आप (अ.स.) ने उस व्यक्ति से फ़रमायाः

तू उस व्यक्ति के समान है जो अपने पीछे वाले सवार को जान से मारने के लिए स्वंय अपने सीने में भाला मार ले।

297
उपदेश कितने अधिक हैं और उन से सीख लेने वाले कितने कम।